मैं ढूंढता रहता हूं, उन लम्हों को हमदम,
जिन लम्हों में मैं, मैं रहता हूं.
ये दिन गुज़रता है नकाब़ों के साये,
बस रात को ही मैं, मैं रहता हूं.
हर लम्हा ढूंढ रहा हूं खुशियों की बस्ती,
क्या जाने किस तलाश में, मैं रहता हूं.
मुझको नहीं यकीन इस बेबस निज़ाम पे,
इक तलाश-ए-वजूद में, मैं रहता हूं.
जाने वो कर सकूं, दिल में दबी है जो,
ख्वाहिशों के पेच-ओ-ताब में, मैं रहता हूं.
मेरे खुदा मुझे चाहे तो मौत दे दे,
काफिर हूं इस खुदी में भी, मैं रहता हूं.
दोस्तो ये कुछ अल्फ़ाज़ जो मेरी जिन्दगी का हिस्सा और सरमाया है आज इस सोच के तहत आपसे बा॑ट रहा हू॑ के जाने कब इस बेचैन रूह को आज़ादी मिल जाऎ ओर वो सब इसी सीने मे दफ़्न रह जाये जो किसी पाक वज़ूद कि अमानत है ओर जिसे ये हक है के ता-कयामत वो इन फ़िज़ाओ मे महकते रहे॑. कौन जाने इन के कारण किसी ओर बेचैन दिल को करार आ जाए. आपका जगजीत सि॑ह (काफ़िर)
Friday, February 19, 2016
मैं रहता हूं
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