Wednesday, August 28, 2019

ग़ज़ल (आंख में अश्क)

आंख में अश्क, दहकता हुआ सीना होगा
जब्र यह है कि इसी हाल में जीना होगा

उनसे कह दो कि वो गुफ़्तार का लहजा परखें
बात कहने का भी कोई तो करीना होगा

बज़्म-ए-हस्ती में, सभी जाम उठाने वालो
मौत जब पेश करे जाम तो पीना होगा

जिसकी आंखों के भंवर में है उभरता साहिल 
मेरे अनफ़ास को हासिल, वो सफ़ीना होगा

मेरी वहशत का तकाज़ा है कि अब मौत आए
होश कहता है  दिल-ओ-जान से जीना होगा

कौन आएगा भला मरहमे दिल को काफ़िर
ज़ख़्म-ए-उल्फ़त को यहां आप ही सीना होगा

जगजीत काफ़िर

Friday, August 23, 2019

ग़ज़ल ( हिम्मत किए बिना )

बैठे रहोगे गर यूं ही जुर्रत किए बिना
पाओगे कैसे मंजिलें हिम्मत किए बिना

ये मुफ़लिसी का ढोंग यूं करना फ़िज़ूल है
मिलता नहीं है रिज़्क तो मेहनत किए बिना

हमको क़ुबूल हैं सभी क़िस्मत के फैसले
खानाबदोश हो गए हिजरत किए बिना

आसां नहीं है इश्क यह, दरिया है आग का
कैसे करोगे पार तुम, जुर्रत किए बिना

आशिक भी इन दिनों यही कहता है हुस्न को
मुझको क़रार चाहिए मिन्नत किए बिना

सोचो ख़ुदा को कौन सा चेहरा दिखाएंगे
गर चल दिए ज़मीन को जन्नत किए बिना

दर से किसी फ़कीर के पाओगे किस तरह
दुनिया की सारी नेमतें, खिदमत किए बिना

काफ़िर को गर खुदा मिले सजदे में जा गिरे
होती है उसकी बंदगी जहमत किए बिना

जगजीत काफ़िर

Friday, August 16, 2019

ग़ज़ल ( अब शरारों को मत हवा देना )

अब शरारों को मत हवा देना
दश्त-ए-दिल को न यूं जला देना

तीरगी जो मिटा नहीं सकते
उन चिराग़ों को तुम बुझा देना

मैं फरिश्तों से बात करता हूं
इसके आगे की तुम दुआ देना

मेरी आंखों ने जो नहीं देखा
ख़्वाब ऐसा कोई दिखा देना

लौट आएगा जो भी अपना है
सिर्फ इक बार तुम सदा देना

दाग़ मिटते नहीं मुहब्बत के
वक्त को बात यह बता देना

फ़िक्र तुमको है सारी दुनिया की
मेरे ज़ख्मों की भी दवा देना

हुस्न-ए-जाना के पास बैठे हो
पैकर-ए-दिल को आइना देना

वो जो काफ़िर तुम्हारा आशिक था
हो सके तो उसे भुला देना

जगजीत काफ़िर

Tuesday, August 6, 2019

ग़ज़ल ( न कोई शिकवा नसीब से है )

न कोई शिकवा नसीब से है, न अब खुदा से कोई गिला है
ये कैसी रहमत हुई है मुझ पर, तुम्हारे जैसा सनम मिला है

फलक से उतरा, जुड़ा ज़मीं पर, मेरा तुम्हारा जो सिलसिला है
तुम्हारे पैकर में ढल के मुझको, इबादतों का सिला मिला है

महक रहा है ये सहने-गुलशन, बहार भी है इसी के दम से
रुको ज़रा तुम, अभी न तोड़ो, अभी अभी तो ये गुल खिला है

ये खुदपरस्ती का शौक इक दिन, निज़ाम-ए-दुनिया बिगाड़ देगा
न जाने कैसा ये फलसफा है, हर एक इसमें ही मुब्तिला है

वो अौर होंगे, जो फ़ुरकतों में, आबाद होकर फना हुए हैं
मुझे न पूछो तबाह हुआ तो, मुझे मुहब्बत में क्या मिला है

न जाने कितने बरस लगे हैं, मुझे तुम्हारे करीब आते
मेरे तुम्हारे मिलन में हमदम, बस अब ज़रा सा ही फासिला है

विसाले शब को घिरा रहूं मैं, तुम्हारी जुल्फों की चिलमनों में
इस एक हसरत के पीछे काफिर, तवील रातों का काफिला है

जगजीत काफ़िर