Sunday, June 12, 2016

बग़ावत

जिस्मों के बाज़ार में जब जरूरत बिकती है,
गर्म सांसो की तपिश से जब रूह पिघलती है,
हवस अपने नकाब से जब बाहर निकलती है,
एक कुचला जिस्म इस निज़ाम का मूंह चिढाता है।
मज़हब के नाम पर जब खून बहता है,
हमसाये से भी कोई दिल ही दिल में डरता है,
इंसान जब वहशत का हमनाम बनता है,
तब शायद कहीं कोई खुदा अश्क बहाता है।
जिन्दगी जब जन्म लेकर बचपन खोती है,
कूड़े में इक निवाले की तलाश होती है,
नंगे बदन हर मौसम की शुरूआत होती है,
अंधी गलियों में हमारा कल मुंह छुपाता है।
बुनियादी ज़रूरतों को जब अवाम तरसता है,
दिलों का ग़ुबार जब आंखो से टपकता है,
इंसान की बेबसी पर जब लहू मचलता है,
काफिर लफ्ज़ों से बग़ावत की बुनियाद बनाता है।

Saturday, June 11, 2016

मैं क्या हूं ?

मैं खुदी में क्या हूं और गफलत में क्या हूं ।
जलवत में क्या हूं और खिलवत में क्या हूं।
चेहरे बहुत हैं हर इक फरद खातिर,
ना जाने कोई के हकीकत में क्या हूं ।
तुम समझते हो के जानते हो मुझे तुम,
नहीं जानते किस फितरत में क्या हूं ।
बरसों हुए ढूंढता हूं खुदी को,
एै काफिर बता किस हालत में क्या हूं ।

Thursday, June 9, 2016

कहानी

कौन समझा है इश्क को काफिर, बड़ी बे-रब्त कहानी है।
इसे अक्ल समझ ना पाएगी, ये दिल की ज़ुबानी है।