मैं खुदी में क्या हूं और गफलत में क्या हूं ।
जलवत में क्या हूं और खिलवत में क्या हूं।
चेहरे बहुत हैं हर इक फरद खातिर,
ना जाने कोई के हकीकत में क्या हूं ।
तुम समझते हो के जानते हो मुझे तुम,
नहीं जानते किस फितरत में क्या हूं ।
बरसों हुए ढूंढता हूं खुदी को,
एै काफिर बता किस हालत में क्या हूं ।
दोस्तो ये कुछ अल्फ़ाज़ जो मेरी जिन्दगी का हिस्सा और सरमाया है आज इस सोच के तहत आपसे बा॑ट रहा हू॑ के जाने कब इस बेचैन रूह को आज़ादी मिल जाऎ ओर वो सब इसी सीने मे दफ़्न रह जाये जो किसी पाक वज़ूद कि अमानत है ओर जिसे ये हक है के ता-कयामत वो इन फ़िज़ाओ मे महकते रहे॑. कौन जाने इन के कारण किसी ओर बेचैन दिल को करार आ जाए. आपका जगजीत सि॑ह (काफ़िर)
Saturday, June 11, 2016
मैं क्या हूं ?
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment