इक तलाश, थोड़े से सुकूं और खुशी की,
सबको है, मगर पूरी नहीं होती।
दोस्तो ये कुछ अल्फ़ाज़ जो मेरी जिन्दगी का हिस्सा और सरमाया है आज इस सोच के तहत आपसे बा॑ट रहा हू॑ के जाने कब इस बेचैन रूह को आज़ादी मिल जाऎ ओर वो सब इसी सीने मे दफ़्न रह जाये जो किसी पाक वज़ूद कि अमानत है ओर जिसे ये हक है के ता-कयामत वो इन फ़िज़ाओ मे महकते रहे॑. कौन जाने इन के कारण किसी ओर बेचैन दिल को करार आ जाए. आपका जगजीत सि॑ह (काफ़िर)
Sunday, May 15, 2016
तलाश
Friday, May 6, 2016
ज़िंदगी
ज़िंदगी हिसाब का सवाल है, कुछ और नहीं ।
इक जानलेवा बवाल है, कुछ और नहीं ।
साल तो बढते हैं, और उम्र घटती जाती है ।
वक्त के ज़र्ब का कमाल है, कुछ और नहीं ।
ये सोचना बशर का, मुकम्मल इसको जान लूं।
सिर्फ ख्याल ही ख्याल है, कुछ और नहीं ।
हर एक शख्स जो, हंसता नज़र आता है,
एक सुलगता सा निहाल है, कुछ और नहीं ।
ये रिश्ते, ये जज़्बे, ये रूतबे, ये निज़ाम,
इंसानी फितरत के जाल हैं, कुछ और नहीं ।
हर चीज़ है मयस्सर, इंसान को जहां में,
बस मौत ही मुहाल है, कुछ और नहीं ।
खुद को खिज़्र ना समझ ऐ काफिर तू,
फनां के तह-ए-बाल है, कुछ और नहीं ।
बवाल = मुसीबत
बशर = इंसान
निहाल = पेड़
मयस्सर = हासिल
मुहाल = मुश्किल
खिज़्र = एक अवतार जो अमर हैं
फनां = मौत
तह-ए-बाल = कैद में
निज़ाम = व्यवस्था