चेतना को मिल रहा है, आज कुछ विस्तार सा.
लड़खड़ाते लक्ष्य को, जैसे मिल रहा आधार सा.
कल्पना पाने लगी है, थाह इस आकाश की.
लग रहा जैसे परो॑ से, छुट गया कुछ भार सा.
आज है मुझ मे समाहित, हर अ॑श इस अस्तित्व का.
प्रकृति के भी ह्रदय से, उमड रहा है प्यार सा.
निस्स्पन्द जल की भांति कुछ, अन्तरम ये शा॑त है.
एक पन्चभूत दृष्टि के अन्दर, हो रहा साकार सा.
कैसे करू मै व्यक्त इस, अव्यक्त से अहसास को.
इस मौन मे तुम्हारी छवी से, कैसा है साक्षात्कार सा.
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