दोस्तो ये कुछ अल्फ़ाज़ जो मेरी जिन्दगी का हिस्सा और सरमाया है आज इस सोच के तहत आपसे बा॑ट रहा हू॑ के जाने कब इस बेचैन रूह को आज़ादी मिल जाऎ ओर वो सब इसी सीने मे दफ़्न रह जाये जो किसी पाक वज़ूद कि अमानत है ओर जिसे ये हक है के ता-कयामत वो इन फ़िज़ाओ मे महकते रहे॑. कौन जाने इन के कारण किसी ओर बेचैन दिल को करार आ जाए. आपका जगजीत सि॑ह (काफ़िर)
Friday, December 6, 2019
ग़ज़ल ( ज़िन्दगी से क्या मिला )
Tuesday, October 22, 2019
ग़ज़ल ( डूबती मौजों में कश्ती जैसे साहिल पर मिले )
Monday, October 7, 2019
ग़ज़ल ( ज़िन्दगी के नाम पर )
चंद सांसें ही मिली हैं, ज़िन्दगी के नाम पर
वो भी ज़ाया हो रही हैं, आशिक़ी के नाम पर
उसने जाना ही था मुझको, यूं अकेला छोड़ कर
कर गया तर्क-ए-तअल्लुक, बेबसी के नाम पर
इस मुहब्बत के लिए, मशकूर हूं मैं आप का
ये ग़ज़ल मैं कह रहा हूं, आप ही के नाम पर
इश्क है किसको ख़ुदा से, बस दिलों का ख़ौफ है
नाम की ही बंदगी है, बंदगी के नाम पर
रहनुमा के भेस में, ताजिर भरे हैं इल्म के
जो अंधेरे बेचते हैं, रौशनी के नाम पर
वो नज़ाकत, वो नफ़ासत, अब कहां बाकी रही
बहर ही तो निभ रही है, शायरी के नाम पर
उसने सीखे ही नहीं थे, तौर दुनिया के अभी
लुट गया काफ़िर जहां में, सादगी के नाम पर
जगजीत काफ़िर
तर्क-ए-तअल्लुक = रिश्ता तोड़ना
मशकूर = शुक्रगुज़ार
ताजिर = व्यापारी
چند سانسیں ہی ملی ہیں۔زندگی کے نام پر۔
وہ بھی زایہ ھورہی ہیں عاشقی کے نام پر۔
اس نے جانا ہی تھا ۔یوں اکیلے مجھے چھوڑ کر
کر گیا ترک تعلق بے بسی کے نام پر۔
اس محبت کیلئے مشکور ھوں میں آپ کا۔
یہ غزل میں کہ رھا ھوں ، آپ ہی کے نام پر۔
عشق ھے کس کو خدا سے ، بس دلوں کا خوف ھے۔
نام کی ہی بندگی ھے ۔بندگی کے نام پر۔
راہنما کے بھیس میں
تاجر بھرے ہیں علم کے۔
جو اندھیرے بیچتے ہیں۔روشنیوں کے نام پر۔
وہ نزاکت ، وہ نفاست ، اب کہاں باقی رہی۔
بحر ہی نبھ رہی ہے۔شاعری کے نام پر۔
اس نے سیکھے ہی نہیں تھے ، تور دنیا کے ابھی۔
لٹ گیا کافر جہاں میں،
سادگی کے نام پر۔
#jagjitkaafir #kaafir
Sunday, September 15, 2019
ग़ज़ल ( और क्या है )
दर्दे-दिल है, शायरी है, और क्या है
अब यही तो ज़िन्दगी है, और क्या है
जो दुखों से हार जाए, टूट जाए
नाम ही का आदमी है, और क्या है
कत्ल होने जा रहा आशिक ये बोला
इक तमाशा आखिरी है, और क्या है
वो अयां है, फिर भी तू महरुम है जो
बस नज़र की तीरगी है, और क्या है
पाक़ इतना और क्या है इस जहां में
मेरी अम्मा की हंसी है, और क्या है
सांस भी ग़र लूं तो उसका नाम आए
इक मुसलसल बंदगी है, और क्या है
हासिल-ए-हस्ती न पूछो काफ़िरों से
इश्क़ है बस इश्क़ ही है, और क्या है
जगजीत काफ़िर
#jagjit_kaafir #kaafir
#jagjitkaafir
Monday, September 9, 2019
ग़ज़ल ( मैं कहां हूं )
ख्वाब हैं, तदबीर है, ताबीर है, पर मैं कहां हूं
उसके पहलू में मेरी तस्वीर है, पर मैं कहां हूं
मैं वही हूं जो च़राग़ों की तरह जलता रहा था
रोशनी पर हो रही तकरीर है, पर मैं कहां हूं
कत्ल होने की तमन्ना थी दिले-बर्बाद की तब
अब लहू की प्यास में शमशीर है, पर मैं कहां हूं
वो ख़ुदा है, नेमतों का, रहमतों का नाम है वो
हाथ में उसके मेरी तकदीर है, पर मैं कहां हूं
ख्वाब आजादी का मेरी आंख में पलता रहा है
आज टुकड़ों में पड़ी जंजीर है, पर मैं कहां हूं
अब ज़रा संजीदगी से ही क़लम को थामना है
शायरी में, फ़ैज़, गालिब, मीर है, पर मैं कहां हूं
सोचनी है, देखनी है, जिंदगी की चाल काफ़िर
इंकलाब-ए-नौ की इक तामीर है, पर मैं कहां हूं
जगजीत काफ़िर
خواب ہیں، تدبیر ہے، تعبیر ہے، پر میں کہاں ہوں
اس کے پہلو میں مری تصویر ہے، پر میں کہاں ہوں
میں وہی ہوں جو چراغوں کی طرح جلتا رہا
روشنی پر ہو رہی تقریر ہے، پر میں کہاں ہوں
قتل ہونے کی تمنا تھی دلِ برباد کی تب
اب لہو کی پیاس میں شمشیر ہے، پر میں کہاں ہوں
وہ خدا ہے نعمتوں کا، رحمتوں کا نام ہے وہ
ہاتھ میں اس کے مری تقدیر ہے، پھر میں کہاں ہوں
خواب آزادی کا میری آنکھ میں پلتا رہا ہے
آج ٹکڑوں میں پڑی زنجیر ہے، پر میں کہاں ہوں
اب زرا سنجیدگی سے ہی قلم کو تھامنا ہے
شاعری میں فیض غالب میر ہے، پر میں کہاں ہوں
سوچنی ہے دیکھنی ہے زندگی کی چال کافر
انقلابِ نو کی اک تعمیر ہے، پر میں کہاں ہوں
-- جگجیت کافر
Friday, September 6, 2019
ग़ज़ल ( हबीब आकर )
हमारे हाल पे रोते हैं सब हबीब आकर
असीर-ए-ग़म को दवा दे कोई तबीब आकर
मेरी तलाश में कब से भटक रही थी जो
लिपट गई है बदन से मेरे सलीब आकर
खुदा के खौफ की बातें, वो ख़्वाब जन्नत के
सुना रहे हैं फसाने, मुझे ख़तीब आकर
तुम्हारे इश्क ने मुझसे, मुझी को मांगा था
बदन उतार दिया है तेरे करीब आकर
मिटा सका ना ख़ुदी को 'तेरी' तरह 'काफ़िर'
इस एक बात पे रोया मेरा रकीब आकर
जगजीत काफ़िर
असीर-ए-ग़म = prisoner of sorrow
ख़तीब = a preacher, a public speaker or Orator
तबीब = doctor, physician
Wednesday, August 28, 2019
ग़ज़ल (आंख में अश्क)
आंख में अश्क, दहकता हुआ सीना होगा
जब्र यह है कि इसी हाल में जीना होगा
उनसे कह दो कि वो गुफ़्तार का लहजा परखें
बात कहने का भी कोई तो करीना होगा
बज़्म-ए-हस्ती में, सभी जाम उठाने वालो
मौत जब पेश करे जाम तो पीना होगा
जिसकी आंखों के भंवर में है उभरता साहिल
मेरे अनफ़ास को हासिल, वो सफ़ीना होगा
मेरी वहशत का तकाज़ा है कि अब मौत आए
होश कहता है दिल-ओ-जान से जीना होगा
कौन आएगा भला मरहमे दिल को काफ़िर
ज़ख़्म-ए-उल्फ़त को यहां आप ही सीना होगा
जगजीत काफ़िर
Friday, August 23, 2019
ग़ज़ल ( हिम्मत किए बिना )
बैठे रहोगे गर यूं ही जुर्रत किए बिना
पाओगे कैसे मंजिलें हिम्मत किए बिना
ये मुफ़लिसी का ढोंग यूं करना फ़िज़ूल है
मिलता नहीं है रिज़्क तो मेहनत किए बिना
हमको क़ुबूल हैं सभी क़िस्मत के फैसले
खानाबदोश हो गए हिजरत किए बिना
आसां नहीं है इश्क यह, दरिया है आग का
कैसे करोगे पार तुम, जुर्रत किए बिना
आशिक भी इन दिनों यही कहता है हुस्न को
मुझको क़रार चाहिए मिन्नत किए बिना
सोचो ख़ुदा को कौन सा चेहरा दिखाएंगे
गर चल दिए ज़मीन को जन्नत किए बिना
दर से किसी फ़कीर के पाओगे किस तरह
दुनिया की सारी नेमतें, खिदमत किए बिना
काफ़िर को गर खुदा मिले सजदे में जा गिरे
होती है उसकी बंदगी जहमत किए बिना
जगजीत काफ़िर
Friday, August 16, 2019
ग़ज़ल ( अब शरारों को मत हवा देना )
अब शरारों को मत हवा देना
दश्त-ए-दिल को न यूं जला देना
तीरगी जो मिटा नहीं सकते
उन चिराग़ों को तुम बुझा देना
मैं फरिश्तों से बात करता हूं
इसके आगे की तुम दुआ देना
मेरी आंखों ने जो नहीं देखा
ख़्वाब ऐसा कोई दिखा देना
लौट आएगा जो भी अपना है
सिर्फ इक बार तुम सदा देना
दाग़ मिटते नहीं मुहब्बत के
वक्त को बात यह बता देना
फ़िक्र तुमको है सारी दुनिया की
मेरे ज़ख्मों की भी दवा देना
हुस्न-ए-जाना के पास बैठे हो
पैकर-ए-दिल को आइना देना
वो जो काफ़िर तुम्हारा आशिक था
हो सके तो उसे भुला देना
जगजीत काफ़िर
Tuesday, August 6, 2019
ग़ज़ल ( न कोई शिकवा नसीब से है )
न कोई शिकवा नसीब से है, न अब खुदा से कोई गिला है
ये कैसी रहमत हुई है मुझ पर, तुम्हारे जैसा सनम मिला है
फलक से उतरा, जुड़ा ज़मीं पर, मेरा तुम्हारा जो सिलसिला है
तुम्हारे पैकर में ढल के मुझको, इबादतों का सिला मिला है
महक रहा है ये सहने-गुलशन, बहार भी है इसी के दम से
रुको ज़रा तुम, अभी न तोड़ो, अभी अभी तो ये गुल खिला है
ये खुदपरस्ती का शौक इक दिन, निज़ाम-ए-दुनिया बिगाड़ देगा
न जाने कैसा ये फलसफा है, हर एक इसमें ही मुब्तिला है
वो अौर होंगे, जो फ़ुरकतों में, आबाद होकर फना हुए हैं
मुझे न पूछो तबाह हुआ तो, मुझे मुहब्बत में क्या मिला है
न जाने कितने बरस लगे हैं, मुझे तुम्हारे करीब आते
मेरे तुम्हारे मिलन में हमदम, बस अब ज़रा सा ही फासिला है
विसाले शब को घिरा रहूं मैं, तुम्हारी जुल्फों की चिलमनों में
इस एक हसरत के पीछे काफिर, तवील रातों का काफिला है
जगजीत काफ़िर
Wednesday, April 3, 2019
ग़ज़ल
राहे अमल पे निकले जो पुर यकीन होकर
सजदे में आ गिरेगा अम्बर, ज़मीन होकर
जिसको सलीब पर भी आता है रक्स करना
वो कब फनां हुआ है गोशानशीन होकर
जो दिलजला कज़ा का दामन पकड़ के गुज़रा
उसको हयात लिपटी है बहतरीन होकर
उसका ख्याल बनकर मुझमें समा गई है
सारे जहां की वुसअत सबसे महीन होकर
ये इश्क है उसी का, उसको ही सौंप दो अब
ये फ़र्ज़ है निभाना तुमको अमीन होकर
कुछ तो कमाल करते, दीवानगी कमाते
पाया ही क्या है तुमने, इतना ज़हीन होकर
हर ऐब को मिटाकर, खुद को निखारना है
काफ़िर चलो दिखाएं आला तरीन होकर
जगजीत काफ़िर
रक्स = नृत्य
गोशानशीन = एकांतवासी
वुसअत = विशालता
अमीन = अमानतदार