एक दिन उसने पूछा कि क्या है तेरे पास ?
और मैंने कहा :-
इन ठोकरों, इन हिकारतों को,
ज़िन्दगी में कमाया है
चन्द शिकवे, चन्द तल्खियों का,
तोहफा वक्त भी लाया है
भीगी आस्तीनों पर कुछ अश्क,
आंखों में मौत का साया है
कुछ ग़म हैं मेरे अपने और,
थोड़ा सा दर्द पराया है
कुछ टूटे रिश्तों का रंज़,
हिस्से में मेरे आया है
सच कहता हूं थोड़ी सी,
रूसवाईयों को भी कब्ज़ाया है
अधूरी सी कुछ ख्वाहिशों से,
इक आशियां बनाया है
कुछ टूटे बिखरे ख्वाबों से,
दरो दीवार को सजाया है
कुछ फरेब मिले हैं अपनों से,
गैरों का सितम भी पाया है
और कुछ अहले जहां का दर्द,
दामन में मेरे समाया है
फिलहाल तो ए काफ़िर मेरा,
बस इतना ही सरमाया है
अभी थोड़े और ज़ख्मों की खातिर,
मुकद्दर को आज़माया है
हिकारत = नफ़रत काफ़िर 18/07/2002