Friday, April 21, 2017

रिश्ता बनाए रखिए

दिल के दश्त-ए-वीरां में फेरा लगाए रखिए
उल्फत के ज़ख्म यादों में ताज़ा बनाए रखिए

माना हमारे दरमियां मुहब्बत को जगह नहीं
नफरत का ही सही रिश्ता बनाए रखिए

मुकम्मल भुला न दीजीए रुसवाईयां इश्क की
नक्श दरो दीवार पे दिल के बनाए रखिए

गर पा गए सुकूं हम तौहीन-ए-मुहब्बत है
इल्तिज़ा है सितम पहले से कुछ तो उठाए रखिए

आऐंगे एक बार फिर लेकर सवाल-ए-इश्क
अपने अहद को आप अपनी ग़ैरत बनाए रखिए

सारे जहां पे ज़ाहिर है काफिर की दीवानगी
बेखुद न होईए, अश्कों से दामन बचाए रखिए

काफिर

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