जिस्मों के बाज़ार में जब जरूरत बिकती है,
गर्म सांसो की तपिश से जब रूह पिघलती है,
हवस अपने नकाब से जब बाहर निकलती है,
एक कुचला जिस्म इस निज़ाम का मूंह चिढाता है।
मज़हब के नाम पर जब खून बहता है,
हमसाये से भी कोई दिल ही दिल में डरता है,
इंसान जब वहशत का हमनाम बनता है,
तब शायद कहीं कोई खुदा अश्क बहाता है।
जिन्दगी जब जन्म लेकर बचपन खोती है,
कूड़े में इक निवाले की तलाश होती है,
नंगे बदन हर मौसम की शुरूआत होती है,
अंधी गलियों में हमारा कल मुंह छुपाता है।
बुनियादी ज़रूरतों को जब अवाम तरसता है,
दिलों का ग़ुबार जब आंखो से टपकता है,
इंसान की बेबसी पर जब लहू मचलता है,
काफिर लफ्ज़ों से बग़ावत की बुनियाद बनाता है।
दोस्तो ये कुछ अल्फ़ाज़ जो मेरी जिन्दगी का हिस्सा और सरमाया है आज इस सोच के तहत आपसे बा॑ट रहा हू॑ के जाने कब इस बेचैन रूह को आज़ादी मिल जाऎ ओर वो सब इसी सीने मे दफ़्न रह जाये जो किसी पाक वज़ूद कि अमानत है ओर जिसे ये हक है के ता-कयामत वो इन फ़िज़ाओ मे महकते रहे॑. कौन जाने इन के कारण किसी ओर बेचैन दिल को करार आ जाए. आपका जगजीत सि॑ह (काफ़िर)
Sunday, June 12, 2016
बग़ावत
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment