Tuesday, July 21, 2020

परवाज़

फकत परवाज़ ही तक़मील-ए-हस्ती तो नहीं
परिंदा अपने बाल-ओ-पर से भी आज़ाद हो

जगजीत काफ़िर
فقط پرواز ہی تکمیل اے ہستی تو نہیں
پرندہ اپنے بال و پر سے بھی آزاد ہو
جگجیت کافر

Wednesday, June 24, 2020

ग़ज़ल (मुश्किल है)

ग़ज़ल غزل

मुस्तकबिल के ख्वाब सजाना मुश्किल है
अब यादों से दिल बहलाना मुश्किल है

जिन गलियों में यार का दामन छूटा था
उन गलियों में आना जाना मुश्किल है

कुछ किरदार निभाए इतनी शिद्दत से
मेरा अपने आप में आना मुश्किल है

आवाज़ों से ज़ख्म हुए हैं कुछ ऐसे
सन्नाटों को भी सुन पाना मुश्किल है

आंसू तो छिप सकते हैं इस दुनिया से
लेकिन दिल की आह छिपाना मुश्किल है

गफ़लत के जो लम्हें ज़िल्लत दे जाएं
उन लम्हों का बोझ उठाना मुश्किल है

मक़तल में इक शर्त उठी थी तौबा की
हंस कर बोला इक दीवाना, मुश्किल है

इस दुनिया में सब कुछ आसां है काफ़िर
बस इक सच्चा इश्क़ कमाना मुश्किल है

مستقبل کے خواب سجانا مشکل ہے
اب یادوں سے دل بہلانا مشکل ہے

جن گلیوں میں یار کا دامن چھوٹا تھا
اُن گلیوں میں آنا جانا مشکل ہے

کچھ قردار نبھائے اتنی شدت سے
میرا اپنے آپ میں آنا مشکل ہے

آوازوں سے زخم ہوئے ہیں کچھ عاسے
سناٹوں کو بھی سن پانا مشکل ہے

آنسو  تو چھپ سکتے ہیں اس دنیا سے
لیکن دل کی آہ چھپانا مشکل ہے

غفلت کے جو لمحے ذلت دے جائیں
اُن لمہوں کا بوجھ اٹھانا مشکل ہے

مقتل میں اک شرط اُٹھی تھی توبہ کی
ہنس کر بولا اک دیوانا مشکل ہے

اس دنیا میں سب کچھ آساں ہے کافر
بس اِک سچا عشق کمانا مشکل ہے

جگجیت کافر / जगजीत काफ़िर

Friday, May 8, 2020

ग़ज़ल ( ढूंढ रही है )

इक बुत है जिसे मेरी नज़र ढूंढ रही है
मुश्किल है मुलाकात मगर ढूंढ रही है
اک بت ہے جِسے میری نظر ڈھونڈھ رہی ہے
مشکل ہے ملاقات مگر ڈھونڈھ رہی ہے

लाखों में किसी एक के कांधों पे मिलेगा
वो सर कि जिसे अज़मत-ए-सर ढूंढ रही है
لاکھوں میں کِسی ایک کے کاندھوں پے ملےگا
وہ سر کے جِسے عظمتِ سر ڈھونڈھ رہی ہے

मंज़िल ने मेरे पाओं को चूमा है कई बार
मैं वो हूं जिसे गर्द-ए-सफ़र ढूंढ रही है
منزل نے میرے پاؤں کو چوما ہے کئی  بار
میں وہ ہوں ج؟سے گردِ سفر ڈھونڈھ رہی ہے

इक बार करो जंग में उस मां का तसव्वुर
जो फ़ौत हुआ लख़्ते जिगर ढूंढ रही है
اک بار کرو جنگ میں اُس ماں کا تصور
جو فوت ہوا لختِ جگر ڈھونڈھ رہی ہے

परवाज़ को बाक़ी हैं अभी और भी अम्बर 
हसरत मेरी अब ज़र्फ़ के पर ढूंढ रही है
پرواز کو باقی ہیں ابھی اور بھی امبر
حسرت میری اب ظرف کے پر ڈھونڈھ رہی ہے

इक रोज़ उदासी ने मेरा नाम सुना था
उस दिन से मुझे शाम-ओ-सहर ढूंढ रही है
اک روز اُداسی نے میرا نام سُنا  تھا
اس دِن سے مجھے شام و سحر ڈھونڈھ رہی ہے

ख़्वाहिश है बड़ी देर से काफ़िर की जबीं को
सजदे के लिए यार का दर ढूंढ रही है
خواہش ہے بڑی دیر سے کافر کی جبیں کو
سجدے کے لیے یار کا در دوند رہی ہے

जगजीत काफ़िर / جگجیت کافر