Friday, July 8, 2011

दिल-ए-इज़्तिराब

क्या तुझसे कहू॑ मैं काफ़िर, क्यों चश्म-ए-आब है.
बे-तरह वलवलो॑ का दिल में सैलाब है.
कैसे करू॑ बयान मैं अपनी जुबान से,
कोई बात ता-ब-लब और दश्त-ए-शराब है.
दहशत है मेरी आ॑ख में पर्वाने की मौत से.
बे-रब्त है॑ ख्याल, दिल-ए-इज़्तिराब है.
ज़ाहिरा थे इस जहान मे तेग-ए-बकफ़ सभी.
तबाही का मेरी बायस, इक बुत-ए-शबाब है.
उलझा था एक बार फ़िर आया ना लौट के.
अल्लाह कैसा ज़ुल्फ़ का ये पेच-ओ-ताब है.
शोहरत है मेरे नाम की सारे जहान में.
कहते हैं मुझको देख कर वही खाना-खराब है.
करिये भी क्या गुरूर इस जिस्म-ए-हकीर का.
मेरी हस्ती की भी हकीकत बस मिस्ल-ए-हुबाब है.

जगजीत सिंह काफिर

चश्म-ए-आब = गीली आ॑ख
ता-ब-लब = होठो॑ पर
रब्त = बे-तरतीब
इज़्तिराब = व्याकुल
ज़ाहिरा = प्रकट मे
तेग-ए-बकफ़ = तलवार हाथ मे लिये
मर्कज़ = केन्द्र
बुत-ए-शबाब = खूबसूरत हसीना
पेच-ओ-ताब = उल्झन
हकीर = तुच्छ
मिस्ल-ए-हुबाब = बुलबुले की तरह
 

Friday, April 8, 2011

दिलासा


जो अश्क छिपे है आँखों मे, इक रोज़ इन्हे बह जाने दे,
ना मुझ से छिपा दिल के छाले, जज़्बो॑ को इन्हे सहलाने दे।

जो राज़ छिपे हैँ तेरे दिल में, तेरे गुजश्ता लम्हों के.
होने दे नुमायाँ वो किस्से, जज़्बात की रौ मे बह जाने दे.

रिश्तो॑ की खलिश है जो तुझको, बे-सूद नही पर मिट जायेगी.
बाहों मे सिमट के मेरी तू , खुद को कभी बहलाने दे.

कश्ती-ए-तमन्ना को माना, साहिल न सही मंझधार सही.
थाम के रख ये हाथ सनम, तूफ़ा॑ को ताकत अजमाने दे.

यूं तो दश्त-ए-रस्म-ओ-जहाँ, कोई राह नही दिवानो को.
मंजिल पे पहुंच ही जाये॑गे, खुद क़दमों को राह बनाने दे.

एहतियाज़ है इस काफ़िर के जुनूँ को, तेरी वफ़ा की शिद्दत की.
इब्तिदा-ए-उल्फ़त को हमदम, अन्जाम पे तू पहुँचाने दे.





खलिश= चुभन
नुमायाँ= ज़ाहिर
बे-सूद= बे-वजह
दश्त-ए-रस्म-ओ-जहाँ= दुनिया की रस्मो क ज॑गल
एहतियाज= जरूरत
इब्तिदा= आर॑भ, शुरुआत

गुज़ारिश


इस तरह हाथ छुडा के तू, कैसे अलग हो सकता है.
साथिया मत छोड के जा, जब लौट के तुझको आना है.
उम्र कि इन लम्बी राहो॑ पर, कैसे चल पाये॑गे तन्हा.
आखिर तो हम दोनो को, इक दूजे का साथ निभाना है.
कैसे गुजर हो सकती है, अम्बर की बाहो॑ मे रहकर.
जो सपने है इन आ॑खो मे, धरती पर उनको लाना है.
मकानो के इस ज॑गल से, पत्थर के लोगो से दूर.
हमको भी इक छोटा सा, खुद का घर बसाना है.
मै रूप हू॑ जैसे बादल का, मिट्टी है तू ममता की.
अपने आ॑गन की बगिया मे, उलफ़त के फ़ूल खिलाना है.
ये क्या के इक दूजे से हम, नाराज़ अभी से हो बैठे.
अभी तो ऐ हमदम हमको, दूर सफ़र पे जाना है.
आ जओ इन बाहो॑ मे, के इन्तजार तुम्हारा अब भी है.
आखिर अपने दीवाने पर, और कितना सितम कमाना है.

अनुभूति


चेतना को मिल रहा है, आज कुछ विस्तार सा.
लड़खड़ाते लक्ष्य को, जैसे मिल रहा आधार सा.

कल्पना पाने लगी है, थाह इस आकाश की.
लग रहा जैसे परो॑ से, छुट गया कुछ भार सा.

आज है मुझ मे समाहित, हर अ॑श इस अस्तित्व का.
प्रकृति के भी ह्रदय से, उमड रहा है प्यार सा.

निस्स्पन्द जल की भांति कुछ, अन्तरम ये शा॑त है.
एक पन्चभूत दृष्टि के अन्दर, हो रहा साकार सा.

कैसे करू मै व्यक्त इस, अव्यक्त से अहसास को.
इस मौन मे तुम्हारी छवी से, कैसा है साक्षात्कार सा. 

Saturday, April 2, 2011

उम्मीद


ये रात ये चा॑दनी ये शादाब हवांएं,
ठहर सी गई हैं फ़िज़ाये॑ भी जैसे.

तस्सवुर है तेरा ,मगर तू नही है,
तुझे पास अपने बुलाऎ॑ भी कैसे.

तू बायस है मेरी हर नफ़्स हर कदम का,
ये हकीकत तुझे हम बताये॑ भी कैसे.

महज़ इश्क ही नही॑, ये इबादत भी है,
ये तुझको यकी॑ हम दिलाऎ॑ भी कैसे.

इक ज़र्रे कि आरज़ू है आफ़्ताब का हासिल,
माफ़ हो॑ अब मेरी ये खताये॑ भी कैसे.

ये मुहब्बत नहीं, हर किसी का मुकद्दर,
दिल-ए-नादां को आखिर समझाऎ॑ भी कैसे.

स॑ग-दिल है के अन्जान या किसी और की तू,
ऐ गुलरू तुझे हम आजमाऎ॑ भी कैसे.

सितम तेरे सहने कि आदत सी पड गई,
गम-ए-इश्क मे अश्क बहाऎ॑ भी कैसे.

मेरे आगोश मे हो तेरी रूह साथ तेरे,
इस खाब को हकीकत बनाऎ॑ भी कैसे.

जब तक ज़िन्दा है इक उम्मीद दिल मे,
ऐ काफ़िर इस जहा॓ से जाऎ॑ भी कैसे.



दर्द के अलफ़ाज़


क्या सोचता है क्या लिखता है तू काफ़िर,
क्यो अपने दर्द को अल्फ़ाज़ देता है.
हैरानगी है तेरे ज़हन की गुरबत पे,
इक दिल्लगी को मुहब्बत का नाम देता है.
सरशार है इक हसीन आग तेरा जिस्म तेरी रूह जलाने को,
तेरी दीवानगी है जो उसकी ओर परवाज़ करता है.
उसी आग मे जलकर उसी मे ज्बज़ हो जाए,
वो शम्मा क्या जाने तू यही जज़्बात रखता है.
ये ज़िन्दगी उसकी, खेले चाहे ख्तम करे,
इक उसके सिवा इसपे कौन इख्तियार रखता है.
दर्द के सिवा इश्क का कुछ और नही हासिल,
और पागल है तू इसी दर्द पे नाज़ करता है.
जब मौत मुकर्रर है तेरी इस इश्क के बायस,
फ़िर लम्हा-लम्हा मौत का क्यो रियाज़ करता है.

Thursday, March 24, 2011

मुझको भुला दो !


ना तडपो मेरे गम मे, शाम-ओ-सहर तुम.
मेरे नक्श अपने दिल से मिटा दो !
ना आ॑सू बहाओ मेरी याद मे अब,
बेहतर यही है के मुझको भुला दो !
एक मुफ़लिस को मोहब्बत जताने से पहले,
अन्जाम-ए-मोहब्बत को सोचा तो होता.
अब जो शिकश्ता हो अपने अहद से,
हर अहद से रिहाई मुझे भी दिला दो.
बेहतर यही है के मुझको भुला दो !
महज़ खाब हू मै ओर कुछ भी नही मै,
हकीकत मुझे तुम बना ना सकोगे.
उम्र कैसे कटेगी किसि खाब के स॑ग,
इस खाब को अब नज़र से गिरा दो.
बेहतर यही है के मुझको भुला दो !
देखो जरा अपनी नज़रे उठा कर,
ये बहारे ये कलिया॑ तुम्हारे लिये है.
ना ठुकराओ इनको मेरी वजह से,
न तर्क-ए-मोहब्बत की खुद को सजा दो.
बेहतर यही है के मुझको भुला दो !


मुफ़लिस=गरीब
शिकश्ता=हारा हुआ
अहद=वचन वादा
तर्क कर्ना=छोडना

ज़ख्म दर ज़ख्म


ज़ख्म दर ज़ख्म है इस इश्क का हासिल,
इन ज़ख्मो की ताब आखिर सह पाउ॑गा कैसे ?
ये रन्ज़-ओ-गम जो सरमाया है अफ़्सुर्दा हयात का,
अश्को से दास्ता॑ इनकी कह पाउ॑गा कैसे ?
उम्र का इक दौर गुज़रा उस साया-ए-ज़ुल्फ़ मे,
साये मे किसी और ज़ुल्मत के रह पाउ॑गा कैसे ?
शरीक-ए-गम भी ना रहा जो शरीक-ए-हयात था,
तन्हा तेरे ही गम को सह पाउ॑गा कैसे ?
माना के मै नही हू नफ़्स-ए-रवा॑ का दुश्मन,
मगर ज़िन्दा तेरे बगैर भी रह पाउ॑गा कैसे ?
ये काफ़िर जो कह चुका के तू हि खुदा है मेरा,
अब खुदा किसी और रिफ़अत को कह पाउ॑गा कैसे ?


अफ़्सुर्दा= उदास
हयात = ज़िन्दगी
ज़ुल्मत = अन्धेरा
नफ़्स= सा॑स
रवा = चलती
रिफ़अत= ऊ॑चाई, महानता

दीवारे


दीवारे है बस दीवारे, दीवारो मे मै रहता हू.
चलते फ़िरते दीवारो से अक्सर टकराता रहता हू.
कुछ दीवारे मज़हब की है.
कुछ दीवारे रुतबे की है.
कुछ दीवारे रिश्ते की है.
कुछ दीवारे जज़्बे की है
कुछ दीवारे सपनो की है.
कुछ दीवारे रस्मो की है.
कुछ दीवारे वादो कि है.
कुछ दीवारे कसमो की है.
कुछ दीवारे मोहब्बत की है.
कुछ दीवारे नफ़रत की है.
कुछ दीवारे बगावत की है.
कुछ दीवारे अकीदत की है.
कुछ दीवारे पथर की है.
कुछ दीवारे कुदरत की है.
कुछ दीवारे वह्शत की है.
कुछ दीवारे फ़ितरत की है.
कुछ दीवारे नज़रो मे है.
कुछ दीवारे अन-देखी है.
कुछ दीवारे आप बनी है.
ओर कुछ हमने पैदा की है.
कुछ दीवारे घर के अन्दर,
कुछ दीवारे दिल के अन्दर.
कभी मै हू अन्दर दीवारो मे,
कभी दीवारे है मेरे अन्दर.
दीवारो मे ही जन्मा हू दीवारो मे ही मर जाउगा॑.
मिट्टी हो कर दीवारो का हिस्सा मै भी बन जाउगा॑.

Thursday, March 17, 2011

तमन्ना


दिल मे यही तमन्ना थी, खत कोई मुझे भि लिखती तुम.
मेरी तरह कभी मुझ से भी, दिल कि दिल से कहती तुम.
हसरत थी मुझको पढने कि, तेरी ज़ीस्त के पन्नो को.
अपने हि लफ़्ज़ो मे ढलकर, मेरी आ॑खो मे खुलती तुम.
आये है सुनते सदियो से, अफ़साने हज़ारो मोहब्बत के.
ऐसी हि किसि दिवानी सि, कभी आकर मुझसे मिलती तुम.
कुछ नक्श बनाए थे मैने, बादल के टुकडो के ऊपर.
कभी आकर र॑ग हकीकत के, उस तस्वीर मे भरती तुम.
नुमाया॑ थी मन्ज़िल कि सूरत, रोशन थी राहे उल्फ़त की.
खुल जाते दरीचे किस्मत के, दो कदम जो साथ मे चलती तुम.
अक्सर हि पशेमा॑ होती है, कुरबत कि तस्वीर यहा॑.
तन्हाई कि इस शिदद्त को, मेरी तरह कभी सहती तुम.
ओर तमन्ना थी इक मेरी, के तेरी तमन्न ये होती.
काफ़िर के इस कालिब मे, रूह कि ज़ानिब रहती तुम.


ज़ीस्त= जिन्दगी
नुमाया॑= प्रकट, सामने
दरीचे= दरवाजे
पशेमा॑= शर्मिन्दा
कुरबत= नजदीकिया
कालिब=जिस्म, शरीर
ज़ानिब= तरह, जैसे

तेरे ख्याल में...


गुज़र गई है ये रात भी, तेरे ख्याल में.
मदहोश था मैं बहका-बहका, तेरे ख्याल में.
मुझको कहा॑ मयस्सर था, मन्ज़र दीदार का.
हासिल हुआ विसाल तेरा, तेरे ख्याल में.
आती हो मेरे पास तो, खाबों मे रोज तुम.
आता हू॑ क्या कभी मैं भी, तेरे ख्याल में ?
हैरत है तुझको रन्ज़ है, हाल-ए-तबाह का.
तू ही बता हयात क्या है, तेरे ख्याल में.
पहले कहा॑ थी शिद्दत इतनी, खिलवत के ख्याल में.
बढती ही जा रही है अब, तेरे ख्याल में.
अलविदा कइ बार बोला, गम गुबार ओर अश्क को.
चले आते हैं फ़िर दोबारा ये, तेरे ख्याल में.
ये काफ़िर जो भूल पाएगा ना, तुझ को तमाम उम्र.
दीवाना सा हो चला है अब, तेरे ख्याल में.


मयस्सर= हासिल
विसाल= मिलन
हयात= ज़िन्दगी, जीवन
खिलवत= तन्हाई

आखिर कैसे


कोइ बताए आखिर कैसे, उनसे हम इज़हार करे.
अपनी नादान मोहब्बत का, कैसे उनसे इकरार करे.
देते है सदाऎ नज़रो से, खामोशि मे सब कहते है.
हिज़ाब की ऐसी मूरत से , अब कैसे हम इसरार करे.
एक ही लम्हे मे जाने वो, कितने र‌॑ग बदलते है.
उस तस्वीर-ए-कयामत के किस र॑ग का हम ऎतबार करे.
कुछ फ़िक्र है उनको दुनिया की, कुछ अपने आप से डरते है.
वो नज़र बचाना चाहते है, हम चाहते है दीदार करे.
हमारे खाबो के गुलिस्ता मे, उनके कदमो कि राह-गुज़र है.
किसि रोज हकीकत बन कर वो, इस वीराने को गुल्ज़ार करे॑.
जिन जज़्बो से आशना है वो, ह॑सते भि है उन्ही पर.
अब ऐसे सितमगर से ऐ काफ़िर, कैसे ना हम प्यार करे.



सदा= पुकार
इसरार=अनुरोध
हिज़ाब=शर्म
आशना=परिचित

Wednesday, March 16, 2011

याद


हर आहट पे दौड उठते थे दरवाजे की ओर हम,
उनका या उनके खत का हमें इन्तज़ार था.
हमारी तमाम उम्र गयी इन आंखो के रास्ते,
जाने कब नसीब-ए-चश्म मे उनका दीदार था.
हासिल कहां था कदमो को उनकी गली का मोड़,
सुनाते भी किस तरह जो हाल-ए-करार था.
पहरे थे हमारी हस्ती पर निगाह-ए-जहान के,
आना हमारा उन को भी कुछ ना-गवार था.
हमको वहम था कुर्बत का उन की अदाओं से,
ये तबस्सुम तो उनकी आदत में कब से शुमार था.
दिल मे यही थी आरज़ू के मिलते कभी उन्हे,
तफ़्सील से निकलता जो दिल में गुबा़र था.
करते दुआ भी कैसे हम उनके विसाल की,
हम को खुदा पे पहले ही कब ऐतबार था.
तर्क-ए-अज़ार-ए-इश्क की नसीहत किये सभी,
क्या कहिये के इसमे काफ़िर ये बे-इख्तयार था.
चश्म = नज़र
कुर्बत = नज्दीकी
तबस्सुम = मुस्कान
तफ़्सील = विस्तार
विसाल = मिलन
अज़ार= रोग
तर्क = छोडना

रिश्ते


रिश्ते ये रिसते रहते हैं नासूर की तरह,
पडते हैं ये निभाने किसी दस्तूर की तरह.
जाएं भी कैसे तोड़ कर बन्धन निज़ाम के,
इसके आगे हम भी हैं मजबूर बे-तरह.
जीना तो यहा पर पड़ता है हर तन्ज़ को सह कर भी,
जिये जा रहे हैं शिकश्ते-चूर की तरह.
कैसे करें मन्ज़ूर हम अपनी हकीकत ये,
निगाह-ए-अहले जहान मे ना-मन्ज़ूर की तरह.
अपनी भी हस्ति का सितारा था कभी बुलंद,
रह गये हैं होकर हम बे-नूर बे-तरह.
क्यों आये इस आलम में क्या हासिल हस्ति का,
जाते हैं काफ़िर जहान से बद-मकदूर की तरह


निज़ाम = वय्वस्था
बे-तरह = बहुत ज्यादा
तन्ज़ = ताना
बद-मकदूर = बद-नसीब

Sunday, March 13, 2011

इल्तिज़ा


दिल के दश्त-ए-विरान मे फ़ेरा लगाए रखिये
उल्फ़त के ज़ख्म यादो मे ताज़ा बनाए रखिये.
माना हमारे दर्मिया मोहब्बत को जगह नही,
नफ़रत का हि सही रिश्ता बनाए रखिये.
मुकम्मल भुला ना दिजिए रुस्वाईया इशक की,
दिल के दरो दीवार पे नक्श इन के बनाए रखिये.
गर पा गए सुकून हम मोहब्बत कि तोहीन है,
इल्तिज़ा है सितम पहले से कुछ तो उठाए रखिये.
आऎगे एक बार फ़िर लेकर सवाल-ए-इश्क,
अपने अहद को आप अपनी गैरत बनाए रखिये.
सारे जहा पे ज़ाहिर है काफ़िर कि दीवानगि.
बेखुद ना होईए अश्को से दामन बचाए रखिये.

Wednesday, March 9, 2011

आखिर क्यो ?


हर बार सिर्फ़ तू बनता है, क्यो कुदरत का मज़ाक काफ़िर.
मोहब्बत कि राह पे बनता है क्यो नफ़रत का हकदार आखिर.
हर बार तेरे हिस्से मे आखिर ये गम क्यो है.
तेरि उदासी का बायस तेरा हि हमदम क्यो है.
जिसे तू चाहे तेरे सिने पे क्यो नश्तर वो हि चलाता है.
अश्को से ज़ख्मो को सीना क्यो तुझको नहि आता है.
क्य ये तेरा नसीब है अपनो से रुसवा होना.
जो भि दिल के करीब हो उसी का दिल से ज़ुदा होना.
खफ़ा खफ़ा सा मुझसे क्यो तेरा रुख-ए-मह्ताब है.
सोज़-ए-दिल कि इन आन्खो से तमन्ना-ए-चन्द-सवालात है.
ना वो समझ पाये ना पायेगे, जो भि मेरे जज़्बात है.
दुश्मन खुदा है या मह्बूब जो ये मेरे हालात है?

दीवानगी


कतरा कतरा दिल के अन्दर दर्द टपकता रह्ता है.
जाने क्यो हर कतरा मुझसे सागर कि खवाहिश करता है.
मै कुरेद रहा हू ज़ख्मो को, के दर्द हि मेरी ताकत है.
अपनो के हाथो ज़खमी होना इस पागल दिल कि आदत है.
क्यो खुशिया ढून्ढू दुनिया मे, खुशियो कि हकीकत झूठी है.
नये दर्द को पैदा करती है, हर आस जो दिल कि टूटी है.
हाथो कुचले अरमानो कि इक कसक सि दिल मे उठ्ती है.
हर कसक के बायस ज़िन्द्गगी मेरि लम्हा लम्हा मिट्ती है.
क्यो तन्हाई मे आने कि अश्को को इज़ाजत देता हू.
खारे पानि के चन्द कतरो को हासिल-ए-मोहब्बत कह्ता हू.
मै डूबा हू पैमानो मे या फ़िर उसकी आन्खो मे.
देखे किस रस्ते पर मुझको कज़ा का दामन मिलता है.

Thursday, February 17, 2011

हकीकत


अपने मुकद्दर की फ़ितरत से वाकिफ़ हूं मैं,
अपनी गुऱबत का भी मुझ को  अहसास है.
महज़ चन्द कतरे हैं हासिल मेरे लबों को,
और समन्दर की दिल मे दबी प्यास है.
सोचने का सबब हैं , ये कुर्बतें भी,
चन्द ही रोज़ की तो रफ़ाकत है तुमसे.
अपने लगते हो जब के हो गैर भी,
किस बिना पर कहूं के मोहब्बत है तुमसे.
मै हिरासां हूं ना टूट जाएं कहीं,
इन दिनो खाब जो तुम दिखाती हो मुझको.
तेरी आदत ही ना हो ये तेरा तब्बसुम,
बे-वजह तुम खिलोना बनाती हो मुझको.
पेश्कदमी से पहले ज़रा सोच लो तुम,
क्या अपने अहद को निभा भी सकोगी?
मेरे हमराज़ हैं मेरे माज़ी के साये,
इन अन्धेरों से खुद को बचा भी सकोगी ?

Tuesday, February 15, 2011

शिकवा


ऎ खुदा तेरे करम पे क्या इतना भी हक नहीं ?
 इस काफ़िर कि कोई आरज़ू मन्ज़िल पे पहुन्च जाये .

इब्तिदा

ज़िन्दगी का यही सरमाया है, तेरे इश्क़ में ऐ हसीना.
दिल के चंद गुबार, जो कागज़ पे लिख लिए.........