Friday, January 19, 2018

ग़ज़ल

गर इरादा भी करूं ना कह सकूंगा दास्तां
मुख़्तसर तहरीर में ये दर्द नां होगा बयां

रो पड़े वक्ते सफ़र वो फुरकतों को सोच कर
भूल बैठे वो बसे हैं धड़कनों के दरमियां

हर मसर्रत बेमज़ा है वो नहीं गर साथ में
महफिलें अब ना रहीं सूना पड़ा है आशियां

ऐ मुहब्बत सिर झुकाना कब मुझे मंज़ूर था
देख़ ताज़ा है अभी मेरी ज़बीं का हर निशां

सब दरों पर जा चुका मैं अब कहां फरियाद हो
किस वली के पैर पकड़ूं हो मुकम्मल दास्तां

जगजीत काफ़िर
पांच सज़दों के सिले में दो दफा मंज़ूर हो
रिज़्क सबको ही मयस्सर हो यहां ए आस्मां

मुख्तसर = संक्षिप्त,
तहरीर = writing, description, composition, document
फुरकत = जुदाई
मसर्रत = खुशी, आनंद
ज़बीं = माथा
मयस्सर = हासिल

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