Friday, December 6, 2019

ग़ज़ल ( ज़िन्दगी से क्या मिला )

जिंदगी से क्या मिला, कुछ भी नहीं
इक मसाफ़त के सिवा कुछ भी नहीं

जो मेरा था वो भी मुझसे छिन गया
उसको पाकर क्या मिला कुछ भी नहीं

रहमतों के वक्त मैं हाज़िर न था
मेरे कासे में गिरा कुछ भी नहीं

गर जबीं से खुद को सजदा हो गया
खुद से खुद का फासिला कुछ भी नहीं

मयकशी का दर्द से रिश्ता है क्या
एक राहत के सिवा कुछ भी नहीं

वो खुदा है जो करे वो सब सही
और मेरी इल्तिज़ा कुछ भी नहीं

इश्क़ में बर्बाद काफ़िर हो गया
और फिर भी क्या गया, कुछ भी नहीं

जगजीत काफ़िर

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