Saturday, April 2, 2011

दर्द के अलफ़ाज़


क्या सोचता है क्या लिखता है तू काफ़िर,
क्यो अपने दर्द को अल्फ़ाज़ देता है.
हैरानगी है तेरे ज़हन की गुरबत पे,
इक दिल्लगी को मुहब्बत का नाम देता है.
सरशार है इक हसीन आग तेरा जिस्म तेरी रूह जलाने को,
तेरी दीवानगी है जो उसकी ओर परवाज़ करता है.
उसी आग मे जलकर उसी मे ज्बज़ हो जाए,
वो शम्मा क्या जाने तू यही जज़्बात रखता है.
ये ज़िन्दगी उसकी, खेले चाहे ख्तम करे,
इक उसके सिवा इसपे कौन इख्तियार रखता है.
दर्द के सिवा इश्क का कुछ और नही हासिल,
और पागल है तू इसी दर्द पे नाज़ करता है.
जब मौत मुकर्रर है तेरी इस इश्क के बायस,
फ़िर लम्हा-लम्हा मौत का क्यो रियाज़ करता है.

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