Saturday, April 2, 2011

उम्मीद


ये रात ये चा॑दनी ये शादाब हवांएं,
ठहर सी गई हैं फ़िज़ाये॑ भी जैसे.

तस्सवुर है तेरा ,मगर तू नही है,
तुझे पास अपने बुलाऎ॑ भी कैसे.

तू बायस है मेरी हर नफ़्स हर कदम का,
ये हकीकत तुझे हम बताये॑ भी कैसे.

महज़ इश्क ही नही॑, ये इबादत भी है,
ये तुझको यकी॑ हम दिलाऎ॑ भी कैसे.

इक ज़र्रे कि आरज़ू है आफ़्ताब का हासिल,
माफ़ हो॑ अब मेरी ये खताये॑ भी कैसे.

ये मुहब्बत नहीं, हर किसी का मुकद्दर,
दिल-ए-नादां को आखिर समझाऎ॑ भी कैसे.

स॑ग-दिल है के अन्जान या किसी और की तू,
ऐ गुलरू तुझे हम आजमाऎ॑ भी कैसे.

सितम तेरे सहने कि आदत सी पड गई,
गम-ए-इश्क मे अश्क बहाऎ॑ भी कैसे.

मेरे आगोश मे हो तेरी रूह साथ तेरे,
इस खाब को हकीकत बनाऎ॑ भी कैसे.

जब तक ज़िन्दा है इक उम्मीद दिल मे,
ऐ काफ़िर इस जहा॓ से जाऎ॑ भी कैसे.



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