ये मेरा शौक-ए-सुखन
और तू गाफिल-इश्क,
क्या जाने कलम में हरकत ये
बे-वजह नहीं आती।
आती हैं यूं तो शोखियां ,
हर इक दौर-ए-बुतां लेकिन,
कोई खुद को खुदा समझे,
इस तरह नहीं आती।
ये तो हम हैं कि बर्बाद
सब कुछ आप कर बैठे,
उस पर बेरूखी तेरी,
नज़र ये सह नहीं पाती।
यूं तो तेरी आंखे हैं
तेरे दिल का आईना,
मगर कोई बात है हमसे
जिसे तू कह नहीं पाती।
मेरी मफलूक हस्ती को
कहां हासिल तेरा दामन,
मेरी शब-ए-नसीबां में
तेरी सुबह नहीं आती।
दिल में इक आग है और आंख में हैं
अश्क काफिर के,
दिखाएं खुद का रुख-ए-खुश,
अदा बस यह नहीं आती।
दोस्तो ये कुछ अल्फ़ाज़ जो मेरी जिन्दगी का हिस्सा और सरमाया है आज इस सोच के तहत आपसे बा॑ट रहा हू॑ के जाने कब इस बेचैन रूह को आज़ादी मिल जाऎ ओर वो सब इसी सीने मे दफ़्न रह जाये जो किसी पाक वज़ूद कि अमानत है ओर जिसे ये हक है के ता-कयामत वो इन फ़िज़ाओ मे महकते रहे॑. कौन जाने इन के कारण किसी ओर बेचैन दिल को करार आ जाए. आपका जगजीत सि॑ह (काफ़िर)
Sunday, August 30, 2015
शौक-ए-सुखन
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