दोस्तो ये कुछ अल्फ़ाज़ जो मेरी जिन्दगी का हिस्सा और सरमाया है
आज इस सोच के तहत आपसे बा॑ट रहा हू॑ के जाने कब इस बेचैन रूह को आज़ादी मिल जाऎ ओर वो सब इसी सीने मे दफ़्न रह जाये जो किसी पाक वज़ूद कि अमानत है ओर जिसे ये हक है के ता-कयामत वो इन फ़िज़ाओ मे महकते रहे॑.
कौन जाने इन के कारण किसी ओर बेचैन दिल को करार आ जाए.
आपका
जगजीत सि॑ह (काफ़िर)
Sunday, July 17, 2016
सवाल
ये जो मसरूफ है तेरी इबादत में,
हर ज़र्रा कायनात का ।
फिर क्यों है गुजश्ता दोज़ख सी,
ज़िन्दगी इंसान की ?
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