ना तड़पो मेरे ग़म में शामों सहर तुम,
मेरे नक्श अपने दिल से मिटा दो।
ना आंसू बहाओ मेरी याद में अब,
बेहतर यही है कि मुझको भुला दो।
मुझको मुहब्बत जताने से पहले,
अंज़ाम ए मुहब्बत को सोचा तो होता।
अब जो शिकश्ता हो अपने अहद से
खुद से रिहाई मुझे भी दिला दो।
बेहतर यही है कि मुझको भुला दो।
महज़ ख़ाब हूं और कुछ भी नहीं मैं,
हकीकत मुझे तुम बना ना सकोगे।
उम्र कैसे कटेगी किसी ख़ाब के संग,
इस ख़ाब को अब नज़र से गिरा दो।
बेहतर यही है कि मुझको भुला दो।
देखो जरा अपनी नज़रें उठा कर,
ये बहारें, ये कलियां तुम्हारे लिए हैं।
ना ठुकराओ इनको मेरी वजह से,
बुझते चिराग़ों को फिर से जला दो।
बेहतर यही है कि मुझको भुला दो।
जगजीत काफ़िर
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